नीतीश कुमार ने पूर्णिया में एक चुनावी रैली में कहा था, “आज चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन है, परसों चुनाव है और ये मेरा आखिरी चुनाव है, अंत भला तो सब भला…”
5 नवंबर को जब उन्होंने मंच से ये बात कही तो कुछ लोगों ने कहा कि उन्हें अब अपना राजनीतिक अंत दिखने लगा है, वहीं कुछ लोगों का कहना था कि नीतीश ने यह इमोशनल कार्ड खेला है ताकि लोग उन्हें एक और बार, अंतिम बार मानकर वोट दे दें.
यह इससे भी समझ में आता है कि जनता दल यूनाइटेड ने ये साफ़ किया है कि ये नीतीश कुमार का आख़िरी चुनाव नहीं होगा लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार ये बखूबी जानते हैं कि उन्हें कब, कितना और क्या बोलना है.
नीतीश कुमार की राजनीति को बेहद क़रीब से समझने वाले पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के प्रोफ़सर डीएम दिवाकर कहते हैं, “नीतीश कुमार कोई हल्की समझ वाले नेता नहीं हैं. वो जो शब्द बोलते हैं बेहद सोच-समझकर बोलते हैं लेकिन इस चुनाव में उन्होंने ऐसा बहुत कुछ बोला है जिस पर यक़ीन नहीं किया जा सकता कि ये सब नीतीश कुमार ने कहा है.”
उनके आख़िरी चुनाव के बयान पर वह कहते हैं, “देखिए पार्टी का जो इंटरनल सर्वे होता है उसमें पहले ही उन्हें ये ख़बर दे दी गई है कि हवा उनके पक्ष में नहीं है और वो जो कुछ लोगों से मिलकर देख रहे हैं उससे भी उन्हें समझ आ रहा है कि एंटी-इंकंबेंसी है. उन्होंने इस बयान के ज़रिए एक स्पेस बना दिया ताकि अगर उन्हें कोई क़दम उठाना पड़े तो वो लोगों को एक हिंट पहले ही दे दें.
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