Raksha Bandhan: Not just a festival for tying rakhi, but a centuries-old tradition of love, trust, and the vow to protect
शिमला। भारत में मनाए जाने वाले प्रमुख पारंपरिक त्योहारों में रक्षाबंधन का विशेष स्थान है। यह पर्व भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास, स्नेह, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। सावन मास की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस पर्व पर बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती है। बदले में भाई अपनी बहन के प्रति प्रेम, सम्मान और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेता है।
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार ‘Raksha Bandhan’ का अर्थ ही ‘रक्षा का बंधन’ है। समय के साथ यह पर्व केवल भाई-बहन तक सीमित न रहकर परिवार, मित्रों और समाज में आपसी विश्वास, सहयोग और स्नेह का संदेश देने वाला पर्व बन गया है।
रक्षाबंधन का मूल भाव है—रिश्तों की रक्षा, विश्वास और जिम्मेदारी। राखी का धागा छोटा जरूर होता है, लेकिन इसके पीछे जुड़ी भावनाएं बेहद गहरी हैं।
बहन जब भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह केवल एक धागा नहीं बांधती, बल्कि अपने भाई के प्रति प्रेम और शुभकामना व्यक्त करती है। भाई भी अपनी बहन के सुख-दुख में साथ खड़े रहने तथा उसकी सुरक्षा और सम्मान के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लेता है।
आज के समय में इस पर्व का अर्थ और भी व्यापक हो गया है। यह हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदनशीलता, सम्मान और सहयोग से मजबूत होते हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी 2026 में रक्षाबंधन की पूर्व संध्या पर अपने संदेश में इसे परिवार और समाज के बीच विश्वास, संवेदनशीलता और आपसी सहयोग मजबूत करने वाला पर्व बताया।
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय धार्मिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा प्रमुख है।
मान्यता के अनुसार एक अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लग गई और रक्त निकलने लगा। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस स्नेह और अपनत्व से श्रीकृष्ण अत्यंत भावुक हुए और उन्होंने उनकी रक्षा का संकल्प लिया।
बाद में महाभारत के प्रसिद्ध चीरहरण प्रसंग में श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी की लाज बचाने की कथा को इसी भाव से जोड़ा जाता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की उंगली पर कपड़ा बांधने और उसे वर्तमान राखी परंपरा से सीधे जोड़ने वाली बात लोकप्रिय धार्मिक परंपरा है; इसे रक्षाबंधन की ऐतिहासिक उत्पत्ति का प्रमाण नहीं माना जाता।
इस कथा का मूल संदेश है—सच्चे स्नेह और छोटे से सहयोग का भी रिश्ता बहुत बड़ा हो सकता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और राजा बलि से संबंधित है।
मान्यता है कि भगवान विष्णु राजा बलि के आग्रह पर उनके साथ पाताल लोक में रहने लगे। भगवान विष्णु के लंबे समय तक वापस न आने से माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। इसके बाद माता लक्ष्मी ने एक ब्राह्मण महिला का रूप धारण कर राजा बलि को राखी बांधी।
राजा बलि ने राखी का सम्मान करते हुए उनसे उपहार मांगने को कहा। तब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वापस भेजने की इच्छा व्यक्त की। राजा बलि ने राखी के बंधन का सम्मान करते हुए उनकी इच्छा स्वीकार की और भगवान विष्णु को उनके साथ जाने दिया।
यह कथा बताती है कि रक्षा सूत्र केवल खून के रिश्ते का बंधन नहीं, बल्कि विश्वास और सम्मान का प्रतीक भी हो सकता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य प्राचीन मान्यता देवराज इंद्र और उनकी पत्नी इंद्राणी से संबंधित है।
कथा के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध के दौरान देवताओं की स्थिति कमजोर हो गई थी। तब इंद्राणी ने धार्मिक विधि और मंत्रों के साथ एक पवित्र रक्षा सूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांधा। इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की।
रक्षाबंधन की प्राचीन परंपरा से जुड़ी इस कथा का उल्लेख भविष्य पुराण से संबंधित परंपराओं में मिलता है।
रक्षाबंधन से जुड़ी चर्चित ऐतिहासिक कहानियों में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कथा भी सुनाई जाती है।
लोकप्रिय कथा के अनुसार रानी कर्णावती ने संकट के समय हुमायूं को राखी भेजकर सहायता का अनुरोध किया था। इस कहानी को अक्सर राखी के उस व्यापक अर्थ के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसमें रक्षा का संबंध केवल परिवार से नहीं बल्कि विश्वास और मानवीय संबंधों से भी हो सकता है।
हालांकि, इस प्रसंग के ऐतिहासिक विवरण और उसकी प्रामाणिकता को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसलिए इसे लोकप्रिय ऐतिहासिक परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।
रक्षाबंधन के दिन राखी की थाली को विशेष रूप से सजाया जाता है। इसमें सामान्यतः राखी, रोली या कुमकुम, अक्षत, दीपक, मिठाई और पूजा की सामग्री रखी जाती है।
बहन भाई को तिलक लगाकर आरती करती है और उसकी कलाई पर राखी बांधती है। इसके बाद भाई बहन को उपहार देता है और उसके सुख-दुख में साथ रहने का संकल्प व्यक्त करता है।
रक्षाबंधन की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह पर्व हमें रिश्तों को निभाने की सीख देता है।
आज भाई-बहन अलग-अलग शहरों और देशों में रहते हैं। कई बार व्यस्त जीवन के कारण परिवार के सदस्यों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम हो जाता है। ऐसे में रक्षाबंधन रिश्तों को फिर से याद करने, साथ बैठने और अपनेपन को महसूस करने का अवसर देता है।
यह पर्व हमें यह भी संदेश देता है कि महिलाओं का सम्मान, परिवार की सुरक्षा, बच्चों की देखभाल और समाज में आपसी सहयोग केवल एक दिन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे जीवन की जिम्मेदारी है।
राष्ट्रपति के 2026 के संदेश में भी रक्षाबंधन को परिवार और समुदायों के बीच संबंध मजबूत करने तथा विश्वास, संवेदनशीलता और आपसी सहयोग को बढ़ाने का अवसर बताया गया है।
रक्षाबंधन हमें याद दिलाता है कि रिश्तों की असली ताकत महंगे उपहारों में नहीं, बल्कि विश्वास, सम्मान, प्रेम और मुश्किल समय में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने में है।
श्रीकृष्ण-द्रौपदी की कथा हो, लक्ष्मी-बलि की पौराणिक मान्यता हो या इंद्र-इंद्राणी की कथा—इन सभी में एक समान संदेश दिखाई देता है: स्नेह से बना बंधन व्यक्ति को सुरक्षा, विश्वास और जिम्मेदारी की भावना से जोड़ता है।
इसीलिए रक्षाबंधन केवल राखी बांधने का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने, परिवार को जोड़ने और समाज में प्रेम व सद्भाव बढ़ाने का पर्व है।
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