Tatkal Samachar
शास्त्र के महान ज्ञाता आचार्य चाणक्य ने जीवन को सफल बनाने को लेकर कई बातें कही हैं. चाणक्य नीति में दूसरे अध्याय के 8वें श्लोक में चाणक्य ऐसे तीन चीजों के बारे में बताते हैं जो मनुष्य के जीवन में कष्ट लेकर आती हैं. आइए जानते हैं इन तीन चीजों के बारे में…
कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्ट च खलु यौवनम्।
कष्टात्कष्टतरं चैव परगृहेनिवासनम्॥
इस श्लोक में चाणक्य कहते हैं कि मूर्खता इंसान के लिए अपने आप में एक बड़ा कष्ट है. मूर्ख व्यक्ति को सही और गलत का पता नहीं होता और इस वजह से वो अपने ही कर्मों के कारण परेशानी में पड़ता रहता है. उसे हमेशा कष्ट उठाना पड़ता है. कौन सी बात उचित है और कौन सी अनुचित इसका पता लगना खुशहाल जीवन के लिए आवश्यक होता है.
चाणक्य कहते हैं कि जवानी भी इंसान को दुखी करती है. इस उम्र में इंसान की इच्छाएं ज्यादा होती हैं और उनके पूरा नहीं होने पर दुख भी काफी होता है. इंसान के जीवन का यह वो दौर होता है जिसमें वो काम के लिए जोश में विवेक खो बैठता है. उसे अपनी शक्ति पर गुमान हो जाता है. इंसान इतना अहंकारी हो जाता है कि वो किसी दूसरे को कुछ नहीं समझता. साथ ही चाणक्य कहते हैं कि जवानी मनुष्य को विवेकहीन बना देती है और इस कारण उसे कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है.
हालांकि, चाणक्य मूर्खता और जवानी से भी ज्यादा कष्टदायी दूसरे के घर में रहने को बताते हैं. चाणक्य के मुताबिक दूसरे के घर में रहते समय इंसान को उसकी कृपा पर आश्रित रहना होता है. इस अवस्था में मनुष्य अपनी स्वतंत्रता खो देता है. इसीलिए कहा गया है कि ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’.
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