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📢विशेष रिपोर्ट: शिमला के ‘रक्षक’ बने पेड़ों के ‘भक्षक’ – कब जागेगा प्रशासन?

शिमला | देवदार के ऊंचे पेड़ों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए विश्व विख्यात शिमला अब ‘अवैध विज्ञापनों का जंगल’ बनता जा रहा है। शहर के प्रवेश द्वारों से लेकर रिहायशी इलाकों तक, पेड़ों के सीने में कीलें ठोककर विज्ञापन टांगे जा रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बैनरों पर दोषियों के नाम और मोबाइल नंबर साफ लिखे हैं, फिर भी वन विभाग, नगर निगम और पुलिस प्रशासन ‘मूकदर्शक’ बना हुआ है।

⚠️ सरकारी खजाने पर ‘डकैती‘: जनता के पैसे से क्यों साफ हो रहा है निजी कचरा?

हैरानी की बात यह है कि इन अवैध बैनरों को हटाने के लिए वन विभाग और नगर निगम को अलग से बजट, जनशक्ति (Manpower) और गाड़ियां लगानी पड़ रही हैं।

  • सवाल: निजी कंपनियों के प्रचार का कूड़ा हटाने के लिए जनता के टैक्स का पैसा क्यों खर्च हो?
  • मांग: इन बैनरों को हटाने में आने वाला सारा खर्च (Labor + Fuel + Resource) सीधे तौर पर विज्ञापनदाता से वसूला जाना चाहिए।

⚖️ कानून की खुली धज्जियां: क्यों नहीं होती सीधी FIR?

नगर निगम अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण नियमों के तहत सार्वजनिक संपत्ति और जीवित पेड़ों को नुकसान पहुँचाना दंडनीय अपराध है।

“जब अपराधी खुद अपना नंबर बैनर पर लिखकर दे रहा है, तो पुलिस और विभाग को साक्ष्य (Evidence) तलाशने की जरूरत ही क्या है? यह सीधे तौर पर कर्तव्य में लापरवाही का मामला है।” — स्थानीय जागरूक नागरिक

🚨 प्रशासन से सीधे 5 तीखे सवाल:

  1. प्रत्येक बैनर पर अलग FIR क्यों नहीं? यदि एक व्यक्ति 50 जगहों पर अवैध बैनर लगाता है, तो 50 अलग-अलग अपराध दर्ज क्यों नहीं किए जा रहे?
  2. वसूली में ढिलाई क्यों? विभाग इन बैनरों को हटाने का बिल संबंधित व्यक्ति को क्यों नहीं भेजता?
  3. जवाबदेही किसकी? अगर कल को कोई पेड़ इंफेक्शन (कील ठोकने के कारण) से गिरता है, तो क्या विभाग उसकी जिम्मेदारी लेगा?
  4. रिकवरी मोड: क्या प्रशासन इन दोषियों के बैंक खाते सीज करने या उनके व्यापारिक लाइसेंस रद्द करने की हिम्मत दिखाएगा?
  5. ब्लैकलिस्ट: बार-बार उल्लंघन करने वाली संस्थाओं को सरकारी विज्ञापनों और कार्यक्रमों से प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता?

🌲 पर्यावरण पर प्रहार

पेड़ों में लोहे की कीलें ठोकने से उनके ऊतकों (Tissues) को स्थायी नुकसान पहुँचता है, जिससे वे अंदर ही अंदर सड़ने लगते हैं। शिमला का ईको-सिस्टम पहले ही दबाव में है, ऐसे में यह मानवीय लापरवाही विनाशकारी साबित हो सकती है।


📝 कार्रवाई की मांग (Call to Action)

जनता की मांग है कि ‘Banner-Free Shimla’ अभियान के तहत:

  • अति शीघ्र के भीतर दोषियों पर F.I.R. दर्ज हो।
  • हटाने का पूरा खर्च जुर्माने के साथ वसूला जाए।

Vijay Sood

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Vijay Sood

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