From Crises to Determination: The Inspirational Success Story of Lokesh Kaundal from Shimla
शिमला, 05 मई: एक छोटे से एक कमरे के घर में, जहाँ रोज़मर्रा की ज़रूरतें अक्सर सपनों से बड़ी लगती हैं, वहीं से एक ऐसी कहानी निकलती है जो यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मेहनत और दृढ़ निश्चय से हर मुकाम हासिल किया जा सकता है। यह कहानी है शिमला के होनहार छात्र लोक़ेश कौंडल की, जिन्होंने Auckland House School for Boys में कक्षा 12वीं में शानदार 90.75% अंक प्राप्त कर मेरिट सूची में अपना नाम दर्ज कराया है।
लोक़ेश का जीवन सादगी, संघर्ष और त्याग का प्रतीक रहा है। उनके पिता नीम चंद, इसी स्कूल में वर्षों से एक कुक के रूप में कार्यरत हैं, जबकि उनकी माता शिव दई सिलाई का काम कर परिवार का सहारा बनती हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद परिवार ने कभी भी अपने बच्चों के हौसलों को कम नहीं होने दिया।
भावुक होते हुए उनके माता-पिता कहते हैं,
“हमने जीवन में कई कठिनाइयाँ देखीं, लेकिन आज हमारे बेटे ने हमें जिस गर्व का अहसास कराया है, वह हमारी सबसे बड़ी कमाई है।”
लोक़ेश ने बचपन से ही यह समझ लिया था कि हालात किसी की पहचान तय नहीं करते। अपने बड़े भाई-बहन से प्रेरणा लेते हुए और पिता की सीख को अपनाते हुए उन्होंने हमेशा अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा।
उनके पिता के शब्द— “लोग आपको नीचे गिराने की कोशिश करेंगे, लेकिन आपको कभी अपना फोकस नहीं खोना चाहिए”—उनकी सफलता की नींव बने।
लोक़ेश केवल एक मेधावी छात्र ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट लीडर भी रहे हैं। Head Boy के रूप में उन्होंने जिम्मेदारी के साथ नेतृत्व किया और अपने आचरण से दूसरों के लिए उदाहरण पेश किया।
उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेल, अभिनय और वक्तृत्व (oratory) में भी सक्रिय भागीदारी निभाई, जिससे उनका सर्वांगीण विकास हुआ।
उनका मानना है,
“All work and no play make Jack a dull boy” — और यही सोच उन्हें मानसिक संतुलन और अनुशासन बनाए रखने में मदद करती रही।
लोक़ेश का अध्ययन करने का तरीका भी बेहद खास है। वे कहते हैं,
“एक घंटे की पूरी एकाग्रता, पूरे दिन की बिना ध्यान वाली पढ़ाई से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है।”
वे दूसरों से तुलना करने में विश्वास नहीं रखते और जरूरत पड़ने पर शिक्षकों से मार्गदर्शन लेने को सफलता की कुंजी मानते हैं।
“शिक्षक हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं, बस आपको पूछना आना चाहिए,” वे कहते हैं।
लोक़ेश की सफलता अचानक नहीं आई है। उन्होंने कक्षा 10वीं में भी 88.80% अंक हासिल किए थे और दो बार राज्यपाल स्तर पर सम्मानित भी हो चुके हैं। उनकी यह निरंतरता और समर्पण ही आज उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया है।
Auckland House School for Boys के प्रिंसिपल ने गर्व व्यक्त करते हुए कहा,
“लोक़ेश की उपलब्धि केवल शैक्षणिक सफलता नहीं, बल्कि उनके मजबूत चरित्र और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण है। उनकी कहानी हर छात्र के लिए प्रेरणा है कि समर्पण और मेहनत से कोई भी सीमा पार की जा सकती है।”
लोक़ेश इस सफलता को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपने माता-पिता के संघर्षों का परिणाम मानते हैं।
“यह मेरी तरफ से अपने माता-पिता के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका है। उन्होंने मेरे लिए बहुत संघर्ष किया है,” वे कहते हैं।
एक सच्चे ‘self-made achiever’ के रूप में लोक़ेश अब भारतीय सेना में डॉक्टर बनकर देश की सेवा करने का सपना देखते हैं। उनका लक्ष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज और देश के लिए कुछ करने का है। लोक़ेश कौंडल की कहानी यह साबित करती है कि सफलता केवल सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह उन लोगों की होती है जो कठिनाइयों के बावजूद हार नहीं मानते।
उनकी यह उपलब्धि हर उस छात्र के लिए एक संदेश है जो सीमित संसाधनों में भी बड़े सपने देखने का साहस रखता है—
“अगर इरादे मजबूत हों, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं।”
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