Former President of Sood Sabha Shimla Kapil Dev Ji passed away
सूद सभा शिमला के पूर्व अध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता और समर्पित समाजसेवी श्री कपिल देव जी का शनिवार प्रातः निधन हो गया। 84 वर्ष की आयु में उनका यूँ अचानक इस संसार से विदा लेना न केवल सूद समाज के लिए, बल्कि सम्पूर्ण शिमला नगर और हिमाचल के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के लिए अपूरणीय क्षति है। वे उन विरले व्यक्तियों में से थे जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा, न्याय और समाज निर्माण को समर्पित था। शुक्रवार को वे हमेशा की तरह हाईकोर्ट गए थे, पुराने मित्रों और सहकर्मियों से भेंट की, शाम को घर लौटे, परिवार से बातें कीं और बिल्कुल स्वस्थ अवस्था में विश्राम किया। शनिवार सुबह उनका अचानक देहांत हो गया। उनका यूँ शांतिपूर्वक जाना भी उनके व्यक्तित्व की गरिमा को दर्शाता है।
श्री कपिल देव जी न केवल एक अनुभवी वकील थे, बल्कि जनहित के सजग प्रहरी भी थे। जब वर्ष 1972 से 1986 तक शिमला नगर निगम के चुनाव बंद कर दिए गए और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित कर दिया गया, तब उन्होंने इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उन्होंने हिमाचल हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की और वर्ष 1986 में न्यायालय से आदेश प्राप्त कर, नगर निगम शिमला के चुनाव फिर से शुरू करवाए। यह कार्य अपने आप में ऐतिहासिक था और इसने शिमला की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को फिर से लोकतांत्रिक राह पर ला खड़ा किया। यह उनका कानूनी ज्ञान ही नहीं बल्कि जनता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और संघर्षशील भावना का परिचायक था।
वे सामाजिक संगठनों में भी सक्रिय रहे। वर्ष 2005 से 2007 तक उन्होंने सूद सभा शिमला के अध्यक्ष पद पर रहते हुए संगठन को सुदृढ़ किया। उनके नेतृत्व में सूद सभा ने अनेक सामुदायिक कार्यों को गति दी। उन्होंने धार्मिक आयोजनों में निरंतर भागीदारी निभाई, समाज को एकजुट किया https://tatkalsamachar.com/shimla-news-passed-away/और युवा पीढ़ी को समाज सेवा के लिए प्रेरित किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संगठन केवल परंपराओं में न सिमटे, बल्कि समाज की बदलती ज़रूरतों के अनुरूप कार्य करे। उनकी सोच आधुनिक थी, परंपरा से जुड़ी हुई, और समाज के हित में स्पष्ट रूप से प्रतिबद्ध थी।
उनका जीवन मंदिर सेवा और धार्मिक कार्यों के लिए एक मिशाल था। वे 60 वर्षों तक विभिन्न मंदिरों से जुड़े रहे। राधाकृष्ण मंदिर के निर्माण में उनकी प्रमुख भूमिका रही। उनका यह स्पष्ट मत था कि मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि समाजिक एकता और सेवा के केंद्र होने चाहिए। उन्होंने मंदिरों को धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सेवा कार्यों का आधार बनाया। गरीबों की सहायता, छात्रों को छात्रवृत्ति, बीमारों के लिए दवाओं का प्रबंध—यह सब उनके जीवन का हिस्सा था। उन्होंने कभी किसी से भेदभाव नहीं किया और हमेशा कहा कि मदद का पहला अधिकार उसी का है जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
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