एक कलाकार के शब्द, हावभाव और भावनाओं की गहराई जब किसी सच्ची प्रेरणादायक कहानी से जुड़ती है, तो वह दर्शकों के हृदय में एक स्थायी छाप छोड़ती है। कुछ ऐसा ही जादुई अनुभव रहा ‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ के प्रदर्शन का, जो ऑकलैंड हाउस स्कूल फॉर बॉयज़, शिमला के सभागार में प्रस्तुत किया गया।

प्रसिद्ध रंगकर्मी लकी गुप्ता द्वारा अभिनीत यह एकल नाटक न केवल एक युवा बालक की संघर्षमयी यात्रा को चित्रित करता है, बल्कि शिक्षकों की भूमिका, माता-पिता की कुर्बानी और संकल्प की शक्ति को भावनात्मक गहराई के साथ दर्शाता है।

प्रदर्शन का सार:

यह नाटक पंजाबी साहित्यकार मोहन भंडारी की कहानी से रूपांतरित है, जो एक निर्धन मजदूर https://youtu.be/NaNGT_T45wE?si=WNWF9ORVLIh9rc8D परिवार के बालक की कथा को मंच पर लाता है। गरीबी, पारिवारिक विषमताओं और सामाजिक चुनौतियों के बीच पलने वाला यह बालक अपने शिक्षक से प्रेरणा लेकर ‘छोटा टैगोर’ कहलाता है। पिता की आकस्मिक मृत्यु और माँ की बीमारी के कारण उसे स्कूल छोड़ना पड़ता है, परंतु शिक्षक की एक पंक्ति—“जिंदगी में कभी हार मत मानना”—उसकी नियति बदल देती है।

 मंचन की विशेषताएं और छात्रों से संवाद

इंटरएक्टिव प्रस्तुति:

इस एक घंटे के एकल प्रदर्शन की सबसे अनोखी बात इसका इंटरैक्टिव प्रारूप रहा, जहाँ लकी गुप्ता ने कई पात्रों को सिर्फ अपने हावभाव, आवाज़ और अदाकारी से सजीव कर दिया। उन्होंने छात्रों को भी मंच का हिस्सा बनाया, जिससे बच्चों की भागीदारी और जुड़ाव और गहरा हुआ।

तकनीक और प्रस्तुति की सादगी:

बिना किसी भारी मंच सज्जा, प्रकाश प्रभाव या संगीत के, लकी गुप्ता ने दर्शाया कि वास्तविक अभिनय का प्रभाव कैसे दिल को छू सकता है। उनकी प्रस्तुति ने यह सिद्ध किया कि सच्चा कला-संप्रेषण शब्दों और संवेदना से होता है, न कि साधनों की भरमार से।

शिक्षाप्रद संदेश:

इस नाटक के माध्यम से विद्यार्थियों को यह सिखाया गया कि:

कठिन परिस्थितियाँ केवल जीवन की परीक्षा हैं, हार का कारण नहीं।

एक शिक्षक का विश्वास शिष्य के भविष्य को बदल सकता है।

माता-पिता के बलिदान और समाज की भूमिका को कभी भूलना नहीं चाहिए।

आभार और संघर्ष से ही आत्मबल का निर्माण होता है।

कलाकार का परिचय और प्रस्तुति का व्यापक प्रभाव

लकी गुप्ता का परिचय:

लकी गुप्ता, जिन्होंने 2000 में जम्मू से रंगमंच का सफर शुरू किया, अब तक 50 से अधिक नाटकों में अभिनय कर चुके हैं। उन्होंने देशभर में 100+ बच्चों की कार्यशालाएं आयोजित की हैं। ‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ उनका विशेष और बहुचर्चित नाटक है, https://tatkalsamachar.com/shimla-news-jathia-devi/ जो अब तक 28 राज्यों के 1000 से अधिक शहरों में मंचित हो चुका है और 50 लाख से अधिक दर्शकों तक पहुँच चुका है—वह भी बिना किसी कॉर्पोरेट सहयोग के, केवल दर्शकों के प्रेम और आत्म-नियोजन के बल पर।

ऑकलैंड स्कूल में प्रभाव:

ऑकलैंड हाउस स्कूल फॉर बॉयज़ में यह प्रस्तुति केवल एक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं रही, बल्कि यह एक जीवन पाठ बन गई।

विद्यालय प्रशासन, शिक्षकों और छात्रों ने इस प्रस्तुति को अत्यधिक सराहा। कई विद्यार्थियों ने मंचन के बाद इसे “जीवन बदल देने वाला अनुभव” बताया।

‘माँ, मुझे टैगोर बना दे’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती प्रेरणा है—जो हर दर्शक को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि हम अपने शिक्षक, माता-पिता और समाज के प्रति कितना आभारी हैं, और अपने सपनों को हासिल करने के लिए कितने प्रतिबद्ध हैं

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